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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

इंसानियत और कानून दोनों को मरते देखा है

आज एक बार फिर से इंसानियत और कानून दोनों को मरते देखा है, क्या दिल्ली को बलात्कारियो का शहर कहना सही नहीं होगा ? दरिंदगी अपने चरम पर है ये हाल सिर्फ दिल्ली में ही नहीं बाकि जगह का भी है. पुलिस वाले केस को रफा दफा
करने की बात करते है और विरोध जताने आई महिला को  थप्पड़ मारते है  ! ये इंसानियत और कानून की मौत नहीं तो और क्या है ? हमारी सरकार से तो उम्मीद रखना ही  बेकार है, सांत्वना व्यक्त कर देने से अगर ऐसे हैवान ख़त्म हो जाए तो विरोध की जगह हर कोई सांत्वना ही व्यक्त करेगा !   ऐसी पुलिस  और सरकार जब तक रहेगी देश में ये हैवान लाख कड़े कानून को ताक़ पर रख कर ये अंजाम देते रहेंगे ! 
देश की अस्मिता हाशिये पर खरी है, देश की अस्मिता लूटती जा रही है और रखवाले अपनी राजनीती में लगे हुए है ! जब  तक  दरिंदो  की  सोच  और  मानसिकता  को  बदला नहीं   जाएगा  और  हमारी  व्यवस्था  कागज   कलम  से  उठ  कर  हकीक़त  वाले  प्रयोग  में  नहीं  आएगी . तब  तक  ये रुकना  अब  तो  नामुमकिन  लगता  है !
अब सवाल ये है की इन मासूम और निर्दोष महिला लड़की और बच्ची का हिफाजत कैसे हो ?? देश के माथे पर कलंक है अगर हमारी सरकार इन सब चीजों को रोकने में  नाकाम रहती है ! क्या है कोई ऐसा नुस्खा जिस से कानून का डर लोगो में हो और दरिंदो की मानसिकता को बदल कर उन्हें फिर से इन्सान बनाया जा सके ?  दुबई का फैसला ही इन सब में ज्यादा कारगर सिद्ध होता है . न  रहेगा  बांस  न  बजेगी  बासुरी  और  जब बांस छीन  जाने  का  डर  पैदा  होगा  फिर  मानसिकता  भी   बदलनी  सुरु  हो  जाएगी  :( :( :( :(
रणजीत

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